पार्किंसंस बीमारी क्या है? कारण, लक्षण, आयुर्वेदिक उपचार, आहार और योग

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पार्किंसंस बीमारी क्या है?

Parkinson disease symptoms causes ayurvedic treatment-पार्किंसंस रोग (Parkinson’s Disease) एक दीर्घकालिक न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जिसमें मस्तिष्क में डोपामिन हार्मोन की कमी हो जाती है। डोपामिन शरीर की गतिविधियों, संतुलन और मांसपेशियों के नियंत्रण के लिये आवश्यक होता है। इसकी कमी से व्यक्ति की चाल, हाथों की हरकत और बोलने की क्षमता प्रभावित होती है।

Parkinson disease symptoms causes ayurvedic treatment

पार्किंसंस के मुख्य कारण

  • मस्तिष्क की डोपामिन बनाने वाली कोशिकाओं का नष्ट होना
  • बढ़ती उम्र (अधिकतर 50 वर्ष के बाद)
  • आनुवंशिक कारण
  • लंबे समय तक तनाव
  • कीटनाशक व रसायनों का अधिक संपर्क
  • ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस

पार्किंसंस के शुरुआती लक्षण

1️⃣ हाथ या उंगलियों में कंपकंपी (Tremor)

पार्किंसंस में हाथ या उंगलियों की कंपकंपी एक सामान्य प्रारंभिक लक्षण है। यह आमतौर पर आराम की स्थिति में होता है, और इसे “विश्राम तंत्रिका कंपकंपी” कहा जाता है। इससे मरीज को हल्के या भारी हाथों की कंपकंपी का अहसास हो सकता है, जो धीरे-धीरे बढ़ सकती है।

2️⃣ चलने में धीमापन

पार्किंसंस रोग में चलने की गति धीमी हो जाती है। मरीज को कदमों में रुकावट महसूस होती है और यह किसी को हटा या मोड़ने में कठिनाई का कारण बनता है। सामान्य गतिविधियों में भी धीरे-धीरे चलने का अनुभव होता है, जो जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।

3️⃣ मांसपेशियों में जकड़न

मांसपेशियों में जकड़न पार्किंसंस के लक्षणों में एक महत्वपूर्ण है। इसमें मरीज को मांसपेशियों का कठोरता या अकड़न महसूस होती है, जिससे दर्द और गति में सीमितता होती है। यह शरीर के विभिन्न हिस्सों, जैसे हाथ, पैर, गर्दन में हो सकता है, और इससे शारीरिक कामकाजी क्षमता पर असर पड़ता है।

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4️⃣ संतुलन बिगड़ना

संतुलन बिगड़ना पार्किंसंस का एक प्रमुख लक्षण है। मरीज को गिरने का डर या शरीर का झुकाव महसूस हो सकता है। यह चलने के दौरान लचीलापन की कमी और कोआर्डिनेशन की समस्या का परिणाम हो सकता है। इसका असर शरीर के नियंत्रण पर पड़ता है, जिससे गिरने की संभावना बढ़ जाती है।

5️⃣ आवाज़ धीमी होना

पार्किंसंस रोग में आवाज़ का धीमा होना एक सामान्य लक्षण है। मरीज को बोलते समय आवाज़ कमज़ोर या सुस्त लगने लगती है, जिससे संवाद में परेशानी होती है। यह स्थिति मस्तिष्क के उस हिस्से में परिवर्तन के कारण होती है, जो आवाज नियंत्रण और मांसपेशियों के कार्य को नियंत्रित करता है।

6️⃣ चेहरे के भाव कम होना

  • पार्किंसंस में चेहरे के भाव कम हो जाते हैं, जिसे मास्क फेस” कहा जाता है। मरीज का चेहरा निरंतर सख्त या भावहीन दिखने लगता है, जिससे उसका मूड या भावनाएँ व्यक्त करना कठिन हो जाता है। यह स्थिति मरीज के सामाजिक जीवन में असर डाल सकती है और दूसरों को उनके इमोशन्स को समझने में समस्या हो सकती है।
  • नींद व कब्ज की समस्या
  • डिप्रेशन या चिंता

🌿 पार्किंसंस के लिये उपयोगी औषधीय पौधे (Ayurvedic Herbs)

1️⃣ कपिकच्छु (Mucuna pruriens)

  • प्राकृतिक L-Dopa का श्रेष्ठ स्रोत
  • कंपकंपी व गति में सुधार
  • आधुनिक दवाओं का प्राकृतिक विकल्प माना जाता है

2️⃣ अश्वगंधा

  • मस्तिष्क कोशिकाओं की रक्षा
  • तनाव व कमजोरी कम करता है
  • न्यूरोप्रोटेक्टिव गुण

3️⃣ ब्राह्मी

  • याददाश्त व मानसिक संतुलन में सहायक
  • नर्वस सिस्टम को मजबूत बनाती है

4️⃣ शंखपुष्पी

  • बेचैनी और अवसाद में लाभ
  • मानसिक शांति प्रदान करती है

5️⃣ हल्दी (Curcumin)

  • सूजन कम करती है
  • न्यूरोडीजेनेरेशन को धीमा करने में सहायक

🌿 कपिकच्छु का सही सेवन तरीका

कपिकच्छु का सेवन सही मात्रा में करना आवश्यक है। आमतौर पर कपिकच्छु चूर्ण 250 से 500 मिलीग्राम सुबह या शाम गुनगुने दूध या पानी के साथ लिया जाता है। यह डोपामिन स्तर को सहारा देता है। यदि कोई एलोपैथिक दवा चल रही हो, तो सेवन से पहले डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।

पार्किंसंस रोग में योग और प्राणायाम – स्वामी रामदेव

स्रोत: पतंजलि योगपीठ द्वारा स्वामी रामदेव का आधिकारिक यूट्यूब वीडियो

🧪 आयुर्वेदिक औषधियाँ (डॉक्टर की सलाह से)

महावत विध्वंस रस

महावत विध्वंस रस एक प्रभावशाली आयुर्वेदिक औषधि है, जिसका उपयोग वात दोष से जुड़ी समस्याओं में किया जाता है। इसका सेवन आमतौर पर 125 से 250 मिलीग्राम, दिन में एक या दो बार शहद या घी के साथ किया जाता है। यह मांसपेशियों की जकड़न, कंपन और तंत्रिका कमजोरी को कम करने में सहायक माना जाता है। इसका सेवन केवल चिकित्सकीय सलाह से ही करना चाहिए।

ब्राह्मी वटी

ब्राह्मी वटी का सेवन दिन में दो बार एक-एक गोली, भोजन के बाद गुनगुने पानी या दूध के साथ किया जाता है। यह दिमाग को शांत करने, याददाश्त बढ़ाने और नर्वस सिस्टम को मजबूत करने में सहायक है। पार्किंसंस में यह मानसिक भ्रम, बेचैनी और तनाव को कम करने में मदद करती है तथा मानसिक संतुलन बनाए रखने में उपयोगी मानी जाती है। 

अश्वगंधारिष्ट

अश्वगंधारिष्ट का सेवन 15 से 20 मिलीलीटर, समान मात्रा में पानी मिलाकर दिन में दो बार भोजन के बाद किया जाता है। यह शरीर को ताकत देने, कमजोरी दूर करने और तनाव कम करने में सहायक होता है। पार्किंसंस रोग में यह मांसपेशियों की शक्ति बढ़ाने, थकान कम करने और नींद की गुणवत्ता सुधारने में लाभकारी माना जाता है।

योगराज गुग्गुल

योगराज गुग्गुल का सेवन सामान्यतः 1 से 2 गोलियां, दिन में दो बार गुनगुने पानी के साथ किया जाता है। यह वात दोष संतुलित करने में मदद करता है और जोड़ों व मांसपेशियों की जकड़न को कम करता है। पार्किंसंस में यह शरीर की अकड़न, चलने में कठिनाई और दर्द को कम करने में सहायक माना जाता है।

कपिकच्छु घृत

कपिकच्छु घृत का सेवन आधा से एक चम्मच, सुबह या शाम गुनगुने दूध के साथ किया जाता है। इसमें प्राकृतिक एल-डोपा तत्व पाया जाता है, जो डोपामिन स्तर को सहारा देता है। यह कंपकंपी, कमजोरी और तंत्रिका संबंधी समस्याओं में उपयोगी माना जाता है। इसका सेवन हमेशा आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह से करें।

🥗 पार्किंसंस में क्या खाएं?

  • हरी पत्तेदार सब्जियाँ
  • अंकुरित दालें
  • अखरोट, बादाम (भिगोए हुए)
  • फल: केला, सेब, पपीता
  • हल्दी वाला दूध

❌ क्या न खाएं

  • जंक फूड
  • ज्यादा चीनी
  • शराब व धूम्रपान
  • बहुत अधिक प्रोटीन एक साथ

🧘 पार्किंसंस के लिये योग व प्राणायाम

योगासन

  • ताड़ासन
  • वृक्षासन
  • भुजंगासन
  • पवनमुक्तासन

प्राणायाम

  • अनुलोम-विलोम
  • भ्रामरी
  • हल्की गति में कपालभाति

योग से संतुलन, लचीलापन और मानसिक शांति बढ़ती है।

🛑 डिस्क्लेमर

यह लेख केवल सामान्य जानकारी और शैक्षिक उद्देश्य के लिए है। किसी भी घरेलू नुस्खे या आयुर्वेदिक उपाय को अपनाने से पहले अपनी स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार डॉक्टर या योग्य आयुर्वेदिक विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें।

⚠️ जरूरी चेतावनी

  • पार्किंसंस का पूर्ण इलाज संभव नहीं, लेकिन सही उपचार से जीवन गुणवत्ता बेहतर की जा सकती है।
  • आयुर्वेदिक उपचार एलोपैथी का विकल्प नहीं, बल्कि सहायक हैं।

दवा कभी भी खुद से बंद न करें।

❓ FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

नहीं, लेकिन सही उपचार से लक्षण नियंत्रित किये जा सकते हैं।

हाँ, लेकिन केवल डॉक्टर की सलाह से।

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अधिकतर 50 वर्ष के बाद, लेकिन कभी-कभी कम उम्र में भी।

लक्षणों को कम करने में सहायक माना जाता है।

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